केंद्र सरकार ने कैप्टिव पावर प्लांट से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए Electricity (Amendment) Rules, 2026 लागू किए

16 Mar 2026      36 Views

  • नए नियमों का मकसद उद्योगों के लिए नियमों को स्पष्ट बनाना और कारोबार करने में आसानी बढ़ाना है. सरकार का कहना है कि इन बदलावों से विवाद कम होंगे और कंपनियां अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन अधिक सहज तरीके से कर पाएंगी

उद्योगों के लिए बिजली उत्पादन को आसान बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने कैप्टिव पावर प्लांट से जुड़े बिजली नियमों में संशोधन कर ओनरशिप और वेरिफिकेशन से जुड़ी कई अस्पष्टताओं को दूर कर दिया है. नए नियमों का मकसद उद्योगों के लिए नियमों को स्पष्ट बनाना और कारोबार करने में आसानी बढ़ाना है. सरकार का कहना है कि इन बदलावों से विवाद कम होंगे और कंपनियां अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन अधिक सहज तरीके से कर पाएंगी।

इन संशोधनों का मकसद उद्योगों के लिए नियमों को ज्यादा स्पष्ट और आसान बनाना है, ताकि कंपनियां अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन में आने वाली कानूनी उलझनों से बच सकें। सरकार के मुताबिक पहले कैप्टिव पावर प्लांट की ओनरशिप को लेकर कई बार अलग-अलग तरीके से व्याख्या की जाती थी, जिससे उद्योगों और बिजली वितरण कंपनियों के बीच विवाद खड़े हो जाते थे।

नए नियमों में इस समस्या को दूर करने के लिए ओनरशिप की परिभाषा को स्पष्ट कर दिया गया है.संशोधित नियमों के अनुसार अब कैप्टिव पावर प्लांट की ओनरशिप में उस कंपनी की सब्सिडियरी, होल्डिंग कंपनी और होल्डिंग कंपनी की अन्य सब्सिडियरी कंपनियां भी शामिल होंगी, जिसने प्लांट स्थापित किया है. इससे समूह कंपनियों के लिए कैप्टिव बिजली उत्पादन को लेकर स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जाएगी।

सरकार ने यह भी तय किया है कि कैप्टिव पावर प्लांट की स्थिति यानी उसका कैप्टिव स्टेटस पूरे वित्त वर्ष के आधार पर सत्यापित किया जाएगा. इसका मतलब यह है कि किसी एक समय की स्थिति के बजाय पूरे साल के आधार पर जांच होगी। इसके अलावा एक अहम प्रावधान यह भी जोड़ा गया है कि जब तक कैप्टिव स्टेटस की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक डिस्ट्रिब्यूशन लाइसेंसी कंपनियां कैप्टिव उपभोक्ताओं से अतिरिक्त चार्ज नहीं वसूल पाएंगी. इससे उद्योगों को अनिश्चितता और अतिरिक्त लागत से राहत मिलेगी।

सरकार ने विवादों को जल्दी सुलझाने के लिए ग्रेविएंस रिड्रेसल कमेटी बनाने का भी प्रावधान किया है, जो कैप्टिव स्टेटस के वेरिफिकेशन से जुड़े मामलों में उत्पन्न विवादों को देखेगी।

नए नियमों के तहत राज्यों को भी भूमिका दी गई है. 1 अप्रैल 2026 से राज्य सरकारें राज्य के भीतर कैप्टिव बिजली खपत के मामलों में वेरिफिकेशन के लिए एक नोडल एजेंसी नियुक्त कर सकेंगी।
वहीं यदि बिजली की खपत एक राज्य से दूसरे राज्य में हो रही है, यानी इंटर-स्टेट कैप्टिव कंजम्प्शन के मामले में जांच National Load Despatch Centre (NLDC) करेगा।

पावर मंत्रालय का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य कैप्टिव बिजली उत्पादन के ढांचे को आधुनिक कॉरपोरेट संरचना और उद्योगों की बदलती एनर्जी जरूरतों के अनुरूप बनाना है. इससे कंपनियां अपनी बिजली जरूरतों को अधिक लचीले और विश्वसनीय तरीके से पूरा कर सकेंगी।
दरअसल, National Electricity Policy 2005 ने भी कैप्टिव पावर जेनरेशन को उद्योगों के लिए विश्वसनीय और कम लागत वाली बिजली आपूर्ति का अहम तरीका माना था.

उद्योगों के पास यदि खुद बिजली बनाने का विकल्प होता है तो इससे ट्रांसमिशन लॉस कम होता है, सिस्टम की कार्यक्षमता बढ़ती है और पावर ग्रिड भी ज्यादा मजबूत बनता है। सरकार को उम्मीद है कि नए नियम लागू होने से उद्योगों को ज्यादा स्पष्टता मिलेगी, विवाद कम होंगे और कैप्टिव पावर प्लांट का इस्तेमाल बढ़ेगा ।